Saturday, November 8, 2025

कोरे कागज़ पर अधूरी पंक्तियाँ

जब दिन ख़ुशनुमा हो तो थोड़ा कम लिखा करता हूँ 
जब रातें अँधेरी हो तो कागज़ पर ग़म लिखा करता हूँ 

जब टूटा हुआ हो दिल तो कम कहा करता हूँ
वफ़ा का घर चुभने भी लगे तो वहीं रहा करता हूँ

जिस रास्ते में साथ न हो कोई वहाँ चला करता हूँ
जैसे धक्के दे दे दुनिया वैसे ढला करता हूँ

जो मुस्कुरा के हाल चाल पूछ लें उनसे मिला करता हूँ
जो न पूछें न मुस्कुराएँ उनके बारे में गिला करता हूँ

जब सारा सब्र थक जाए तभी रूठा करता हूँ
कभी कभी कुछ बदनसीब लोगों पे थोड़ा फूटा करता हूँ

जिनसे प्यार करता हूँ उनसे उनकी प्यार की कहानियाँ सुना करता हूँ
जब कहानियों में कुछ दु:साध्य मोड़ आए तो अपनी कहानियाँ बुना करता हूँ

जिसकी चाह एक बार ठान ली उसी की ज़िद करता हूँ
जो उसे पाने में साथ जुड़ जाएँ उन्हें ही मुर्शिद करता हूँ

मेज़ पे चाय के कप एक आएँ या दो
मेज़ भी वही और चाय भी वही रहती है
कोई भूला-बिसरा अगर ज़िंदगी पर मेरी राय पूछ ले तो
इन बातों पे मेरी राय भी वही रहती है

मगर क्या करें हम भी, ताली बजती है तो बस दो हाथों से
दिन सँवरते हैं और बिगड़ते हैं तो बस जज़्बातों से
हाथों से बस स्नेह मिले, काबू में वैसे हाथ तो नहीं
दिन का सूरज उनसे ही चढ़े, उनसे ही ढले, वश में वैसे जज़्बात तो नहीं

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