Saturday, February 10, 2024

शबाब

कुछ प्यार यूं मेरे अंदर ही ढल जाएगा 

यह एक तरफ़ा पागलपन खुद ही संभल जाएगा 

जब उस खुदा का निर्णीत एक कल आएगा 

मेरे ईमान और दर्द का ज़रूर कोई तो फल आएगा 


सुना है तुम मेरी वफ़ा का फल बन कर आयी हो 

अपने साथ अरमानों का एक गुलदस्ता भी लेकर आयी हो 

माफ़ करना मुझे, मेरा रोने का कोई इरादा नहीं था 

पूरा हो पाए जो प्यार की ख़ातिर, मैंने देखा कोई वादा ही नहीं था 


यहाँ तो हर मोड़ पर , हर कोई प्यार का इंतज़ार कर रहा है 

जिससे दिल लगाए बैठा है, उसी के प्यार की कहानियाँ सुन रहा है 

मैंने भी वैसे किस्से कहाँ तुमको बताये हैं 

मुझे भी मालूम है की हम सब प्यार के थोड़े थोड़े सताये हैं 


अपनी चाय की प्याली में हम उम्मीद घोल कर पीते थे 

यूँ ही सताए सही, हम हल्का मुस्कुरा कर ही जीते थे 

पत्तों के बीच से छुपके आने वाली धुप की किरण के जैसी तुम आना, हम दिल से मुस्कुरायेंगे 

ख़ुशी से सींच सींच कर एक प्यारी फुलवारी हम भी बनाएंगे 


जो पथिक प्रेम का सताया हुआ उस बगीचे में आएगा 

प्रतिदत्त प्रेम की सौम्यता वह भी देख पायेगा 

किस्मत में जो लिखा हो उससे हम कहाँ लड़ सकते हैं 

मगर प्यार के ज़खम भी हम लोग ऐसे ही तो भर सकते हैं 

कोरे कागज़ पर अधूरी पंक्तियाँ

जब दिन ख़ुशनुमा हो तो थोड़ा कम लिखा करता हूँ  जब रातें अँधेरी हो तो कागज़ पर ग़म लिखा करता हूँ  जब टूटा हुआ हो दिल तो कम कहा करता हूँ वफ़ा का घर...