The first two lines of this poem are inspired by Gulzar's famous lines.
ये जो तेरी आँखों में नमी सी है
इसका कारण मेरी कमी ही है
सच कहने की हिम्मत नहीं
क्योंकि सच से दिल दुःखता है
झूठ से कोई शिकायत नहीं
क्योंकि झूठ कहाँ चुभता है?
इस झूठ की कश्मकश में हम कहाँ रुक गए
दिल की ज़िद के सामने हम कहाँ झुक गए?
हमें लगा था अकेले हम बिल्कुल चल ना
पाएंगे
किसे पता था तुम्हारे बिन महीने गुज़र
जायेंगे
देख हमने अकेले भी क्या क्या करना सीख़
लिया
जो भी फ़ैसला लिया था तूने,
अब
लगता है ठीक लिया
सामने भी आ जाओ तो वो बात कहाँ रहेगी
लगा नहीं था कि तू मेरे साथ ना रहेगी
फिर भी क्यों एक बार तुझे देखने को दिल तरसता है
आँखों का बादल ना जाने क्यों बरसता है
तुम हो या ना हो, कोइ
फ़र्क तो नहीं
लगा था मुझे पहले ही, यह
कोई तर्क़ तो नहीं
उम्मीद है की फिर तुझसे कभी बात होगी
मेरे लिए तेरे दिल में कोई जज़्बात होगी
उन बातों को कहकर
जज़्बातों को ढहकर
तू फिर से मुस्कुराएगी
तभी तू एक बार और, मेरी कहलाएगी
मैं भी तेरे साथ बेफ़िक्र मुस्कुराउँगा
तेरा था, तेरा हुँ , और तेरा ही कहलाउंगा ||
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