Monday, January 24, 2022

Hindi poem - Tumhari

 तुम्हारी


जिनपर मैं इतनी कविताएं लिखता हूँ

उनसे मैंने एक दिन पूछा

जब तुम अपनी आत्मकथा लिखोगी

क्या उसमे मेरा अध्याय होगा भी

या सिर्फ़ एक पन्ना

क्या उसमें मेरा ज़िक्र सिर्फ़ एक अजनबी की तरह करोगी

या होउंगा मैं कोई अपना

 

जब तुम वही गाने सुनती हो जो हम सुना करते थे

या वही डांस करती हो जैसा हम नाचा करते थे

या वहीं घुमा करती हो जहाँ हम घूमा करते थे

क्या ख़याल आता है तुम्हारे मन में

क्या कुछ भी यादगार किया था मैंने तुम्हारे जीवन में

 

इतने में वह कहती है

"तुम्हे भूल जाने की उम्मीद तो कम है

माना की पुराने हमारे कई सारे ज़ख़्म हैं

लेकिन ज़ख्म का मतलब ये तो नहीं की मुझे अब प्यार नहीं है

तुम्हारे और मेरे बीच में जुड़े कुछ तार नहीं हैं

सुबह सुबह दौड़ने से लेकर रात को सोने जाने तक

दिन में कई बार तुम्हारे नाम का नगमा गुनगुनाती हूँ

तुम्हे देखना चाहिए जब चेहरे के एक कोने से दूसरे कोने तक

मैं होठों से ही नहीं, आँखों से भी मुस्कुराती हूँ"

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