तुम्हारी
जिनपर
मैं इतनी कविताएं लिखता हूँ
उनसे
मैंने एक दिन पूछा
जब
तुम अपनी आत्मकथा लिखोगी
क्या
उसमे मेरा अध्याय होगा भी
या
सिर्फ़ एक पन्ना
क्या
उसमें मेरा ज़िक्र सिर्फ़ एक अजनबी की तरह करोगी
या
होउंगा मैं कोई अपना
जब
तुम वही गाने सुनती हो जो हम सुना करते थे
या
वही डांस करती हो जैसा हम नाचा करते थे
या
वहीं घुमा करती हो जहाँ हम घूमा करते थे
क्या
ख़याल आता है तुम्हारे मन में
क्या
कुछ भी यादगार किया था मैंने तुम्हारे जीवन में
इतने
में वह कहती है
"तुम्हे भूल जाने की उम्मीद तो कम है
माना
की पुराने हमारे कई सारे ज़ख़्म हैं
लेकिन
ज़ख्म का मतलब ये तो नहीं की मुझे अब प्यार नहीं है
तुम्हारे
और मेरे बीच में जुड़े कुछ तार नहीं हैं
सुबह
सुबह दौड़ने से लेकर रात को सोने जाने तक
दिन
में कई बार तुम्हारे नाम का नगमा गुनगुनाती हूँ
तुम्हे
देखना चाहिए जब चेहरे के एक कोने से दूसरे कोने तक
मैं
होठों से ही नहीं,
आँखों
से भी मुस्कुराती हूँ"
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